झाबुआ। वर्तमान भौतिकता की चकाचौंध में नन्हे से बालक से लेकर बुजुर्ग अवस्था के व्यक्ति के हाथ में संचारक्रांति का एक ऐसा माध्यम आ गया जिसके चलते पलभर में दुनिया की खोज खबरें तो पा लेता है। साथ ही संचार की इस क्रांति व भौतिकता की चकाचौंध में साहित्य व संगीत जो पोराणिक काल में चलता था वह अब शनै:-शनै: विलुप्त होने लगा और पाश्चात्य संगीत ठेठ गांव, खेड़ों से लेकर महानगरों तक ऐसा हावी हुआ कि शास्त्री संगीत सुनना ही कर्णभेदी लगने लगा और पाश्चात्य संगीत इतना कर्णप्रिय हो गया कि जो गीत-संगीत पूर्व में शास्त्री संगीतों के आधार पर थे। उन्हे भी भौतिकता की चकाचौंध व पाश्चात्य संस्कृति के संगीत ने ऐसा संजोया कि हर कोई पूर्व के शास्त्री संगीत सुनने की बजाय ''रिमिक्स" शास्त्री उर्फ पाश्चात्य संगीत सुनना पसंद करते है। स्थिति यह हो गई कि पाश्चात्य संस्कृति व भौतिकता की चकाचौंध में विश्व पटल से शास्त्री संगीत विलुप्त होने लगा। जब तक शास्त्री संगीत के क्षेत्र में कुमार गंधर्व थे तब तक यह माना जा रहा था कि पौराणिक काल से लेकर वर्तमान तक शास्त्री संगीत जीवन्त है, लेकिन शास्त्री संगीत के महान गायक कुमार गंधर्व के देवलोक गमन होते ही शास्त्री संगीत पर पाश्चात्य संगीत हावी होने लगा।  
           ऐसे में शास्त्री संगीतकार स्वर्गीय कुमार गंधर्व के सुपुत्र पंडीत भुवनेश्वर ने शास्त्री संगीत का वर्चस्व कायम करने का संकल्प लिया और अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए शास्त्री संगीत का न केवल अलख जगाना शुरू किया अपितु अपने पिता की तर्ज पर नए शिष्यों को भी शास्त्री संगीत की शिक्षा देने लगे। उन्ही में से पंडित भुवनेश्वर कौमकली देवास का एक शिष्य डॉ. दीनदयाल चौरसिया भी शामिल हुआ। 
शासकीय संगीत शिक्षक हैं 
प्रदेश भर में शास्त्री संगीत का अलख जगा रहे युवा डाक्टर चौरसिया-Youth-Artist-Chaurasia-waking-up-the-classical-music-of-the-stateयुवा तुर्क 42 वर्षिय डॉ. दीनदयाल चौरसिया वर्तमान में देवास जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय में संगीत शिक्षक है। इससे पूर्व डाक्टर चौरसिया आदिवासी बाहुल झाबुआ जिले के थांदला स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में भी संगीत शिक्षक रह चुके है। गत 14 वर्षों से न केवल शासकीय सेवा में ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हुए जवाहर नवोदय विद्यालय में शास्त्री संगीत का अलख जगा रहे अपितु अवकाश के दिनों में प्रदेश भर में विशेष कर प्रदेश के पिछड़ा व आदिवासी बाहुल जिलों के निजी तथा सरकारी स्कूलों में पहुंचकर शास्त्री संगीत का अलख जगा रहे है। 
           इसी कड़ी में डाक्टर दीनदयाल चौरसिया बीते दिनों जिला मुख्यालय स्थित शारदा विद्या मंदिर में पहुंचे जहां संस्थापक ओम शर्मा, किरण शर्मा सहित पूरे स्टाफ ने न केवल डाक्टर चौरसिया का स्वागत व सम्मान किया अपितु शास्त्री संगीत की शिक्षा बच्चों में देने हेतु अनोपचारिक कार्यक्रम आयोजित किया। उक्त कार्यक्रम में डाक्टर दीनदयाल चौरसिया ने तनपुरे के संगीत के साथ न केवल सरस्वती वंदना पेश की अपितु नन्हे विद्यार्थियों से लगाकर संस्था के स्टाफ को भी अवगत कराया कि शास्त्री संगीत का जो महत्व पौराणिक काल में था वह अब भी है पर हमारी कुछेक गलतियों की वजह से पाश्चात्य संगीत हम पर हावी होने लगा है। तय है हम जिस तरह एक बीज रोप कर पौधा पनपाते है और उस पौधे को जिस ओर झूकाना चाहते है उस ओर झुकता है। फर्क सिर्फ हमारी शुद्ध सोच और संस्कृति में है।
         डाक्टर चौरसिया द्वारा शारदा विद्या मंदिर में दिये गये नि:शुल्क शास्त्री संगीत प्रशिक्षण और बच्चों को दिये गये ज्ञान की बच्चों ने कर्तल ध्वनि से स्वागत किया तो संस्था ने भी कार्यक्रम के अंत में प्रदेशभर में पिछड़ों व आदिवासी बाहुल जिलों मे शास्त्री संगीत का अलख जगाए रखने वाले युवा तुर्क डाक्टर दीनदयाल चौरसिया का भावभीना सम्मान किया। इस अवसर पर संस्था संचालक ओम शर्मा ने कहा कि शास्त्री संगीत के क्षेत्र में जो कार्य डाक्टर चौरसिया कर रहे है वह न केवल सराहनीय है अपितु भौतिकता की चकाचौंध में विलुप्त होती संस्कृति बचाने का सार्थक प्रयास है। अभी तो सिर्फ एक संस्था में ही आयोजन हुआ। भविष्य में जिले की अन्य शासकीय अशासकीय संस्था में भी पहुंचकर डाक्टर चौरसिया शास्त्री संगीत का अलख जगाए ऐसा प्रयास हम सब मिलकर करेंगे।