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देवझिरी....जैसा की नाम से ही प्रतीत है की भगवान शिव (देव, एक देवता) और झिरी या एक बारहमासी वसंत ! वसंत एक कुंड में निर्मित किया गया है. एक समाधि बैसाख पूर्णिमा, जो अप्रैल के महीने में आयोजित की जाती है. देवझिरी तीर्थ में भगवान शिव का भव्य मंदिर चारो तरफ हरियाली युक्त द्रश्य और मंदिर प्रांगन में ही एक जल कुंड जहा पिछले कई वर्षो से नर्मदा नदी का जल अनवरत प्रवाहित हो रहा है ,, जल का निकास और मार्ग आज तक सभी भक्तो के लिए एक आश्चर्य का विषय है की यह जल कुंड यहाँ तक किस मार्ग से आ रहा है .. देवझिरी तीर्थ एक धार्मिक, ऐतिहासिक, पर्यटन और एक चमत्कारिक स्थल जहा भक्तो की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है
Deojhiri-JHABUA-A-Famous-Religious-Place            देवझिरी के इतिहास इस तरह है की प्राचीन काल में देवझिरी तीर्थ में किसी समय सिंघा  जी नाम के सन्यासी हुआ करते थे वे  प्रतिदिन यहाँ शिव जी का अभिषेक नर्मदा के जल से किया करते थे , देवझिरी से लगभग 150 किलोमीटर दूर कोटेश्वर से प्रतिदिन नर्मदा का जल लाना और उसी जल से शिव जी का अभिषेक करना , सिंघा जी की दिनचर्या थी , समय गुजरता गया , सिंघा  जी वृद्ध  हो गए मगर फिर भी उन्होने नर्मदा के जल से शिव जी का अभिषेक बंद नहीं किया , एक दिन सिंघा जी के तप  और साधना से माँ नर्मदा प्रसन हुई और सिंघा  जी को साक्षात् दर्शन देते  हुए  कहा की में वाही आउंगी जहा से तुम आते हो सिंघा  जी ने कहा की में कैसे मान  लू की आप आएँगी माँ नर्मदा ने कहा की तुम्हारा कमंडल यही छोड़ जाओ . 
           सिंघा   जी ने वैसा ही किया और अपना कमंडल वही  छोड़ कर देवझिरी आश्रम चले आये ,, अगले दिन जब बाबा सिंघा  जी की नींद खुली तो देवझिरी में एक छोटे जल स्त्रोत से निरंतर जल प्रवाहित हो रहा था ,,, साथ ही इस जल स्त्रोत के अन्दर सिंघा  जी का वह कमंडल जिसे वह नर्मदा नदी पर छोड़ कर आये थे वह भी मोजूद था .... इस प्रकार उस दिन से देवझिरी तीर्थ पर नर्मदा नदी का जल अनवरत प्रवाहित हो रहा है .. सिंघा  जी ने इसी देवझिरी तीर्थ पर समाधी ली .... आज भी प्रतिदिन इस नर्मदा नदी के जल से शिव जी का अभिषेक किया जाता है .....वर्ष 1934 में झाबुआ के महाराजा ने यहाँ एक कुंड  का निर्माण करवाया .....देवझिरी तीर्थ पर  झाबुआ जिले के ग्रामीणों की विशेष आस्था है ,, शहर में प्रति वर्ष निकलने वाली कावड  यात्रा में ग्रामीणों द्वारा कोटेश्वर महादेव से नर्मदा का जल ले जाकर देवझिरी तीर्थ में शिव जी का अभिषेक किया जाता है।  देवझिरी तीर्थ में भक्तो की मान्यता है की यहाँ  प्राचीन काल में एक शेर आया करता था , जो देवझिरी के कुंड  में स्नान करता और फिर शिव जी के दर्शन कर  चला जाता ....ग्रामीणों और भक्तो में यह मान्यता आज भी उसी रूप में है।
   इस प्रकार देवझिरी तीर्थ झाबुआ जिले के साथ ही पूरे प्रदेश में एक अलग महत्वता के साथ एक ऐसा  प्राचीन स्थल , धार्मिक स्थल , और पर्यटन स्थान जहा एक बार भगवान  शिव के दर्शन करने के उपरांत ताउम्र इस स्थान की दिव्य  छवि सदेव हर भक्त के  जहन  में बनी रहती है ।

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बड़े तालाब के समीप सात हज़ार वर्ग फ़ीट में बना राम शरणम् के विशाल भवन आस्था का तीर्थ बन गया है भवन के निर्माण में झाबुआ कुशलगढ़ एवं दाहोद क्षेत्र के हज़ारो श्रद्धालुओं ने अपना पसीना बहाया है यही वजह है की बाजार मूल्य के हिसाब से पोन दो करोड़ का यह भवन मात्र २८५ रूपये वर्ग फ़ीट के हिसाब से ९० लाख रुपये में ही बन कर तैयार हो गया .
       भवन का कुल निर्मित क्षेत्रफल ३३ हज़ार २५० वर्ग फ़ीट है इसमें पांच सो साधक एक साथ रहकर साधना कर सकेंगे . तल मंजिल पर बने विशाल हाल में ७०० साधक साधना कर पाएंगे। भवन निर्माण का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है निर्माण के लिए भूमि पूजन के पहले ही उद्घाटन की तिथि तय कर ली गयी थी . २६  जनवरी को भूमि पूजन कर २७ जनवरी को पहली गेती चलायी गयी थी उसके बाद से लेकर अब तक करीब पांच हज़ार राम नाम साधक २५ हज़ार मानव दिवस का श्रमदान कर चुके है साधक सुबह और शाम दो से छह घंटे श्रमदान करते थे व्यापारी रात को दुकान मंगल करने के बाद सुबह ४ बजे तक काम में लगे रहते।
      रविवार को तो जैसे श्रम का महोत्सव होता लोग भोजन पानी साथ लेकर परिवार सहित निर्माण स्थल पर आ जाते  और पूरा दिन काम में लगे रहते। १३ महीनो तक हज़ारो लोगो ने श्रमदान कर रेकॉर्ड लागत में साधना स्थली को आकर दिया जो झाबुआ ही नहीं पुरे क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गया है
        राम शरणम् का यह भवन सद्भावना की मिसाल बन चूका है भवन निर्माण के लिए संस्था ने किसी से राशि नहीं मांगी लोग खुद चलकर सहयोग के लिए आये इतना ही नहीं मुस्लिम और ईसाई समुदाय के सेकड़ो लोगो ने भवन निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग दिया है।
     भवन का पांच दिवसीय उद्घाटन समारोह ३ मार्च २००६ को हुआ जिसमे संत शिरोमणि श्रद्धेय श्रीमंत विश्वामित्र जी महाराज शामिल हुए. कार्यक्रम में देश भर से ५० हज़ार से अधिक श्रद्धालुओं उपस्थित रहे।
फैक्ट फाइल 
  1. भवन का निर्माण देश की सबसे सस्ती दरों पर हुआ जबकि गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया गया निर्माण की लागत २५० रुपये वर्ग फ़ीट आई है। 
  2. भवन के लिए सात हज़ार फीट जमीन 12 लाख रुपये में खरीदी गयी यह जमीन पहले राजा की थी जिस पर हाथी बांधे जाते थे बाद में इसे पांच व्यवसायियों ने खरीद लिया
  3. संस्था के सदस्यों के अलावा १७ हज़ार लोगो ने ९० लाख रुपये की राशि स्वेछा से बिना मांगे दी जो अपने आप में एक मिसाल है तीनो जिलों में संस्था के कुल ४५ हज़ार सदस्य है। 
  4. भवन में तल सहित कुल चार मंजिल है जिसमे पांच सो से अधिक साधक एक साथ रहकर आराधना कर सकेंगे। 
अनुभूतियाँ
     मैं अनुसूचित जाति वर्ग से हूँ और ५ वीं कक्षा तक पढा हूँ । मेरा सवा करोड़ जाप का संकल्प चल रहा है,पर मैं ६-७ वर्षों से नियमित जीप ध्यान , पाठ व नियमित सत्संग कर रहा हूँ । मुझे श्री राम शरणम् परिवार में सम्मान मिला। ध्यान में बडा मज़ा आता है, कभी ऊबा नहीं या आलस्य नहीं हुआ। आंतरिक दोषों से तेज़ी से मुक्ति हो रही है और भले भावों का उदय हो आया है। अभिमान में कमी आई है । 
       सहनशीलता, विनम्रता का निवास हो रहा है।मुझे स्पष्ट लगता है कि पहले से मुझमें बहुत सुधार हुआ है । जब मैं दूसरों की उन्नति देखता हूँ तो मुझे याद आता है कि वास्तव में राम परम कृपा स्वरूप है। स्वयं पर दुख आता है तो," भजिए राम राम बहु बार" पंक्तियाँ याद आती हैं और मुझे संकटों से छुटकारा मिल जाता है ।
       " जपते राम नाम महा माला, लगता नरक द्वार पर ताला" का अर्थ ध्यान में जानना चाहा तो अनुभूति हुई - शराब, जुआ, व्यभिचार, चोरी, पाप हत्या ये ही नरक है।
इस घोर कलिकाल में जहाँ धर्म के नाम पर क्या क्या वहीं हो रहा है, ऐसे समय एक सच्चे सद्गुरू का मिलना साक्षात परमात्मा की ही कृपा है। हम हर घडी आपको याद करते रहें ।
रमेश चम्पा बसोड़, कुन्दनपुर

      मेरा सवा करोड़ जाप संकल्प ८ माह में पूर्ण हे गया इस हेतु माँ प्रतिदिन ५-६ घण्टे जाप करता था। मैंने सोचा अब तो यह महामंत्र सिद्ध हो गया होगा पर मुझे कैसे पता चलेगा। तभी अनुभूति हुई कि परमात्मा और गुरूजन मेरे शरीर में प्रवेश कर गए हैं और उन्हीं की शक्ति से यह हो गया । 
संकल्प पूर्ण होने के दूसरे ही दिन मेरी २ वर्षीय बिटिया को बिच्छु ने काट लिया, उस समय मेरा अमृतवाणी करने का वक़्त हो गया। मैंने ध्यान नहीं दिया और नियत समय पर पाठ में बैठ गया। बिना उपचार के बेटी स्वयमेव पीडा मुक्त हो गई। मेरा राम नाम में दृढ विंस्वास हो गया.भ्रम संशय मिट गए ।सद्गुरू समर्थ हैं उन्होनें हमें सीधे परमात्मा से मिला दिया। उनकी प्रेरणा मिलती रहे।
रमेश गेहलोत, ग्राम सेमलिया

डिस्कवर भारत के साथ एक विशेष साक्षात्कार (जनवरी 2001) में डॉ. गौतम चटर्जी डॉ. विश्वामित्र जी महाराज से बातचीत के कुछ अंश 
       परम पावन स्वामी सत्यनंद जी महाराज और श्री प्रेम जी महाराज की सूक्ष्म प्रेरणा और आशीर्वाद के साथ सत्सग में शाम 7.00 बजे हर रोज शाम में अमृतवानी सत्संग आयोजित किया जा रहा है। बाद में, यह निर्णय लिया गया कि सत्संग का कार्य कुछ स्थानीय साधक को सौंपा जाना चाहिए। इसलिए बापू श्री जगन्नाथ सिंह राठौड़ के घर पर शुरू किया गया था और अभी भी एक ही स्थान पर है। श्रद्धालु दिन-ब-दिन सत्संग में एकत्र होना शुरू हो गए । बाबू श्री जगन्नाथ ने अपने घर की छत पर सत्संग हॉल का निर्माण करने की अनुमति दी। अब "श्री राम शरणम् " इस स्थान पर "हमारे विश्वास का प्रतीक है" बापू जी की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी माता रतंकुवरजी प्रभारी बन गई और बाद में उनकी मृत्यु के बाद श्री कैलाश चंद राठौर वर्तमान प्रभारी थे। यह सर्वशक्तिमान का सरासर अनुग्रह है कि सत्संग नियमित रूप से आयोजित किया जा रहा है और 1971 के बाद से एक निश्चित समय पर और कभी भी बाधित नहीं हुआ है।
        यह पवित्र स्थान आत्मा के जागृति के लिए सबसे पवित्र, जीवित केंद्र के रूप में लोकप्रिय है। स्वामी जी महाराज को प्रमुख के रूप में माना जाता है और सभी काम उनके दिशानिर्देशों के अनुसार किया जाता है। वहां से जारी किसी भी घोषणा, अनुरोध या निर्देश को स्वामी जी के आदेश के रूप में माना जाता है और हमेशा उसका अनुपालन किया जाता है क्योंकि सामान्यत: प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत दिव्य अनुभवों की संख्या होती है हम सभी का दृढ़ विश्वास है कि गुरु देव सत्संग में हर दिन हमें यात्रा करते हैं और सत्संग अपने दिव्य प्रेरणा के तहत आयोजित की जाती हैं। परम पूज्य गुरुदेव श्री प्रेम जी महाराज झाबुआ में आना चाहते थे लेकिन डॉक्टर की सलाह के कारण वह अपने जीवन काल के दौरान शारीरिक रूप में ऐसा नहीं कर सके। श्री प्रेम जी महाराज ने एक बार पत्र में लिखा था कि उन्हें डॉक्टर से अनुमति मिलने के बाद वह झाबुआ से मिलने का प्रयास करेंगे। एक बार जब वह इंदौर से झाबुआ के लिए रवाना हो गए, लेकिन उन्हें घबर से वापस जाना पड़ा। "श्री राम शरणम् " के साथ जुड़े सभी स्वयंसेवकों को पूरी तरह से विश्वास है कि श्री महाराज जी हमारे साथ है । वह आम तौर पर यहां आते हैं, वह हमारे साथ सत्संग के लिए बैठे  है और हम सभी को उनकी उपस्थिति महसूस होती है। यह मूर्खतापूर्ण और भावनात्मक लग सकता है लेकिन यह एक अनन्त सत्य है कि गुरुदेव श्री प्रेम जी महाराज आमतौर पर झाबुआ की यात्रा करते हैं। 
         में एक दिल्ली के साधकको जनता हूँ , जो श्री प्रेम जी महाराज के करीबी थे, उन्हें गुलाब का बहुत शौक था। मेरा विश्वास करो कि मुझे अपने घर में कई बार गुलाब की सुगंध महसूस हुई थी, हालांकि उस समय मेरे घर के पास कोई गुलाब संयंत्र नहीं था। मैं निश्चित रूप से महसूस करता हूं कि श्री महाराज जी जब भी मैंने उन्हें बुलाया - तब भी जब वह हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद थे और अब जब भी जब उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया है। मैंने कई संन्यासी और महात्मों से मुलाकात की है, लेकिन श्री प्रेम जी महाराज को मिलने के बाद मेरी आत्मा को आंतरिक संतुष्टि मिली है जो शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। यद्यपि उस समय मुझ में कोई आध्यात्मिक जिज्ञासा या प्यास नहीं थी और मेरी आँखें हमेशा नश्वर दुनिया पर थीं। एक सद्गुरु  से मिलना और "श्री राम नाम" नाम की दीक्षा लेना , मेरी सांसारिक जीवन में हासिल करने का मुख्य उद्देश्य था और आज मैं अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करता हूं कि मैंने हमेशा इस नश्वर संसार के लिए पूछा। 
         आध्यात्मिक प्रगति महान संपत्ति है यहां पर कई लोगों का मानना ​​है कि श्री प्रेम जी महाराज ने सब कुछ दिया है, संसार की प्रगति के लिए या उनके जीवन काल की आध्यात्मिक प्रगति के लिए, फिर श्री राम नाम बहुत पहले इस क्षेत्र में फैल गया होगा और इस क्षेत्र का आध्यात्मिक दृश्य पूरी तरह से अलग होगा। । श्री प्रेम जी महाराज की चुप्पी हमेशा उनकी सबसे बड़ी प्रेक्वीन रही है। भौतिक संबंध और कभी भी प्रक्रियाओं को बदलते हुए एक व्यक्ति को पूरी दुनिया के ब्रह्मांडीय चेतना के साथ पूर्ण रूप से अभ्यस्त कर सकते हैं। वह शारीरिक रूप में और साथ ही एक आत्मा हमेशा हमारा मार्गदर्शन कर रही है  और हम हमेशा अपने पवित्र पैरों के शांत शरण का आनंद लेते रहेंगे। हम सभी मनुष्य के समूहों जो श्रीराम शरणम् और अंधेरे से जुड़े हुए हैं, ऐसे एक अद्वितीय भक्त के साथ श्री राम शरणम्  में अविश्वास के विश्वास के साथ आशीषित हैं हमारे गुरुओं में से सबसे ज्यादा प्यार और धन्य है वह एक मार्गदर्शक ,उद्धारकर्ता, प्रेरणा स्रोत, मुक्तिदाता, बेहद उदार, विनम्र, संतों को क्षमा करना, ग्रामीण गांव में यात्रा करना और कुछ घरों के एक समूह से दूसरे में आध्यात्मिकता के प्रकाश को उजागर करना वाला । 
      हम बहुत भाग्यशाली हैं हम बुरे दिमाग वाले, कुटिल लोग आपकी क्षमता के दृढ़ संत के योग्य नहीं थे। संभवतः, यह हमारे पिछले जन्म के अच्छे कार्यों का परिणाम है या यह इस स्थान का सम्मान या महिमा था, जब आप 1995 में झाबुआ गए थे। धार्मिक और आध्यात्मिक पथ पर चढ़ने के लिए बेहद साहसी काम है। डरपोक इस रास्ते पर चल नहीं सकते हैं, झाबुआ की मिट्टी में साहस और साहस के साथ भक्ति की खुशबू भी है। इस क्षेत्र के आदिवासी को आपराधिक दिमाग माना जाता है, लेकिन इन व्यक्तियों के पास एक गुणवत्ता है, साहसिक कार्य की गुणवत्ता। वे देश के कानून को तोड़ने और सामाजिक सीमाओं के अवरोध में अपनी बहादुरी दिखाते हैं। अगर उनकी इस गुणवत्ता को सही रास्ते पर चढ़ाया जाता है, तो वे आध्यात्मिकता के रास्ते पर बहुत तेजी से चलते हैं। इस काम से सम्मानित गुरुदेव श्री विश्वमित्र जी महाराज के आशीर्वाद से संभव हो गया था। 
     इन आदिवासी जो स्वयं को अस्पृश्य और दलित पीड़ितों के रूप में मानते थे, जिन्हें समाज के द्वारा सदियों से हटा दिया गया था, उन्हें महाराज जी ने गले लगाया था कि उन्हें सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार दिया जाए, जिससे उन्हें कई जीवन के शापित जीवन से मुक्त कर दिया जाए। जब श्री महाराज जी ने तथाकथित बेहद बुद्धिमान शहरी और साधारण लोकतांत्रिक भीलियों को संबोधित किया और उन्हें "भक्ति का मार्ग" समझाया, तो उन्होंने राम नाम जपना आरम्भ किया और उसके बाद जब श्री महाराज जी ने इन सरलता वाले भीलों के साथ भोजन किया, इन आदिवासियों में असीम प्रेम था और उन्हें अपने दिल से एहसास हुआ कि इस मार्ग पर दुनिया का कोई संत ऐसा नहीं है। यहां जाति और धन की असमानता नहीं है, न ही दान प्रसाद के बारे में कोई भ्रम है। 
          झाबुआ में आपकी पहली यात्रा पर आपके चारों ओर इकट्ठे हुए श्रद्धालु ऐसे प्रतीत होते थे जैसे गोपी भगवान श्रीकृष्ण के चारों ओर इकट्ठा हुआ करती थी । आपने अपनी पहली प्रवचन में स्वीकार किया कि "मैं गुरुओं के प्रति असीम प्यार और ईमानदारी से भक्ति देखकर बहुत अधिक उत्साहित हूं और प्रेम के अतिरिक्त कुछ अतिरिक्त बोलना मुश्किल है।"  इस क्षेत्र में अभी भी राम नाम के विस्तार की संभावना है। यद्यपि आपने कुछ वर्षों के भीतर इस क्षेत्र में आश्चर्यजनक क्रांति के बीज बो दिए हैं और अगर आपकी कृपा जारी रहती है तो झाबुआ के लाखों गरीब लोगों की मुक्ति संभव होगी। यद्यपि इन्हें मनोदशा और सुबोधन किया जाता है और कुछ उथले प्रचारकों द्वारा गहरी खाई में अच्छी तरह से धकेल दिया जाता है जो स्वयं स्टाइल वाले गुरुओं और निर्दोष आदिवासियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं और गुमराह करते हैं।
      यह शाश्वत सत्य है कि श्री सत्यानंद जी महाराज ने श्रीराम शरणम्  अभियान की स्थापना की है और दिल्ली और हरिद्वार के श्रीराम शरणम् ने अपनी दिशा-निर्देशों के अनुसार स्थापित किया था। गुरु-कुल समर्पण के अनुसार आपके अच्छे भगवान (परम पूज्य श्री विश्वमित्र जी महाराज) हमारे वर्तमान गुरु हैं जो पवित्र सीट पर बैठे हैं। कोई भी अन्य व्यक्ति उपदेशक हो सकता है, लेकिन कभी भी एक सदगुरु नहीं हो सकता। श्री राम शरणम्  "सिद्ध-पीठ ", एक मंदिर है, क्योंकि यह स्वामी जी महाराज की अलौकिक शक्तियों के साथ संपन्न हो चुके हैं, गुरु देव श्री प्रेम जी महाराज ने इस दिव्य और अद्भुत रूप से ऐसा किया है इस स्थान के " श्री प्राधिकृत जी " श्री राम को हमारे लिए अभिव्यक्त किया गया है क्योंकि यह उचित रीति-रिवाजों के द्वारा पवित्र रूप से स्थापित किया गया था। 
     इसलिए दिल्ली और हरिद्वार के श्री राम शरणम् अपने भक्ति के पूर्ण केंद्र हैं। हम अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानते हैं की आपके जैसे गुरु महाराज (स्वामी जी महाराज और श्री प्रेम जी महाराज) का दर्शन हुआ । जो लोग अन्य स्थानों पर मठों की स्थापना करते हैं वे कभी भी सक्षम गुरु नहीं हो सकते हैं। श्री महाराज जी! मैं विनम्रतापूर्वक और ईमानदारी से अनुरोध करता हूं कि आप एक वर्ष में कम से कम एक बार झाबुआ पर ध्यान देकर इस जगह के लाखों लोगों को अपने दर्शनों से लाभान्वित करे जिससे वे आपकी शिक्षाओं और मुक्ति के रास्ते पर लगातार चलना जारी रखे ।


झाबुआ : मातंगी मंदिर प्रांगण में ही सिध्दपीठ बालाजी धाम है। बालाजी के इतिहास के बारे मे तो किसी के पास वास्तविक जानकारी तो नही है लेकिन बताया जाता है कि कभी घने जंगलो के बीच पहाडी पर हनुमानजी का छोटा सा चबुतरा हुआ करता था कृषि विभाग के कर्मचारी नित्य पुजन प्रारंभ किया । 
       वर्ष 1993 में जनसहयोग से सुंदर व मनोरम मंदिर का निर्माण हुआ और विधिवत भगवान की प्राण प्रतिष्टा का गई।पिछले 16 वर्षो से प्रतिदिन यहॉ रामायण का पाठ किया जा रहा है। प्रति शनिवार मंदिर में सुंदरकांड का पाठ भी किया जाता है। पुराणो के अनुसार नित्य पुजन पाठ लगातार 12 वर्षो तक करने से वह स्थान सिद्व हो जाता है। इसलिए बालाजी धाम को सिद्वपीठ बालाजी धाम कहा जाताहै। मंदिर की देख रेख का जिम्मा कृषि विभाग के कर्मचारी श्री शिवनारायण पुरोहित पिछले 16 वर्षो से सभाल रहे है। श्री पुरोहित की सेवानिवृति का समय निकट होने से अब यह दायित्व सभी कई सहमति से श्री राकेश त्रिवेदी को सौपा गया है। वे यह कार्य पुरी निष्ठां से कर रहे है।

balaji-dhaam-jhabua-सिध्दपीठ बालाजी हनुमान मंदिर झाबुआ
 


हरियाली युक्त वातावरण में निर्मित मातंगी मंदिर चारो और से हरियाली से ढकॉ हुआ है। मंदिर में खडे होकर जिस और भी नजर जाती हरियाली और सुंदरता से भरे दृश्य ही दिखाई देते । मातंगी धाम पर ऐसी हरियाली व विहंगम दृश्य देखकर अनुभुति होती है कि प्राचीनकाल में निशचित ही यहॉ कोई देव्य शक्ति प्रत्यक्ष रूप में विद्यमान रही होगी जिसके ही दिव्य साये के रूप में आज यह स्थल इतनी विशालता एवं इतने वर्षो के बाद भी आज उसी प्राचीन काल की मौजुदगी इन हरियाली आछादित वादियो में दर्शा रहा है।         
religious-place-matangi-darshan-dhaam-jhabua               फ़रवरी २०११ में मातंगी धाम झाबुआ में नवनिर्मित मंदिर स्थल का निर्माण पश्चात् मातंगी की मूर्ति स्थापना की गयी , कार्यक्रम चार दिनों का था जिसमे मातंगी मूर्ति की स्थापना के साथ ही मातंगी का पाटोत्सव भी भव्य रूप में मनाया गया। सेकडो वर्ग फीट में फैला मातंगी मंदिर शहर के बिल्कुल मध्य भाग में स्थित है । 
           मातंगी मंदिर इंदौर अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही स्थित है। झाबुआ शहर के मध्य भाग में स्थित मातंगी मंदिर कई बडे शहरों जिनमें इंदौर, दाहोद आदि कई शहरों से बिल्कुल सटा हुआ है। मातंगी धाम से दाहोद शहर की दुरी मात्र 75 कि.मी है , व इंदौर शहर से दुरी मात्र 150 कि.मी है। इसके अलावा मध्य बिंदु में स्थित होने के कारण अन्य स्थानो से भी मातंगी धाम की दुरी अधिक नही है। मातंगी धाम के पास में ही कई छोटे छोटे गॉव है जिनमें रानापुर, थांदला , जोबट, मेघनेगर आदि है जो मातंगी धाम से कुछ ही कि.मी की दुरी पर है । इनमें मेघनगर जो कि मातंगी धाम से मात्र 15 कि.मी की दुरी पर स्थित है वहॉ पर रेल्वे स्टेशन की सुविधा भी है अन्यत्र स्थानो से आने वाले लोगो के लिए जो रेल मार्ग से मातंगी तक पहुचना चाहते है वे सीधे ही रेल मार्ग से मेघनगर आकर यहॉ से उपयुक्त व्यवस्था बस ,जीप आदि व्यवस्था कर बिना किसी परेशानी के मातंगी धाम तक पहुच सकते है।


मातंगी धाम आधिकारिक वेबसाइट


      झाबुआ शहर के मध्य भाग में स्थित गोपाल मंदिर जिले भर में अपनी अलग पहचान बनाये हैं. वैसे तो शहर मैं सेकडो मंदिर हैं पर गोपाल मंदिर शायद अपने अलग अस्तित्व एवं प्राचीन स्म्रतियो के कारण शायद यहाँ के लोगो को और अन्यत्र निवासरत लोगो को अपनी और आकर्षित करता हैं. माँ गोपाल अपने पुरे परिवार के साथ यहाँ पर विराजित हैं मंदिर प्रांगन मैं समय समय पर विभिन् आयोज़न किये जाते हैं जिनमे प्रमुख वार्षिक उत्सव, गुरु पूर्णिमा आदि हैं. यहाँ पर विभिन् उत्सव जैसे राम नवमी,कृष्ण जन्माष्टमी,गणेश चथुर्ति आदि को भी भव्य रूप मैं मनाया जाता हैं.
          गोपाल मंदिर का वार्षिक उत्सव प्रति वर्ष मई माह मैं मनाया जाता हैं उत्सव चार दिन का होता हैं जिसमे पुरे मंदिर पर आकर्षक साज़ सज्जा की जाती हैं गोपाल मंदिर झाबुआ के आलावा जन्त्राल , भरूच, महू और इंदौर मैं भी हैं गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इन जगहों पर भी भव्य आयोज़न किये जाते हैं. झाबुआ स्थित गोपाल मंदिर मैं कार्य समिति के देखरेख मैं विभिन् संस्थाए भी संचालित की जाती हैं जिनमे श्री गोपाल वाचनालय, श्री गोपाल शिशु विद्या मंदिर आदि हैं. वाचनालय मैं धार्मिक, संस्कृतिक, साहित्यिक जैसे कुल २०००० हज़ार पुस्तकों का संग्रह हैं. विद्यालय मैं कक्षा १ से ५ तक कक्षाए आयोजीत की जाती हैं जिनका अधिपत्य एवं सञ्चालन मंदिर कार्यसमिति द्वारा किया जाता हैं. मंदिर मैं प्रातकाल मैं ९:३० बजे आरती की जाती हैं एवं सांयकाल मैं ८ से ९ भजन संध्या आयोजीत की जाती हैं विभिन् उत्सव के दोरान मंदिर मैं विशाल भंडारे का अयोज़ं किया जाता हैं जो मंदिर प्रांगन मैं होता हैं. 
           गोपाल मंदिर का निर्माण आज से करीब 40 वर्ष पूर्व हुआ था तब यह स्थान पूरी तरह रिक्त था तथा मंदिर निर्माण के पश्चात् यहाँ कालोनी का निर्माण किया गया जिसे गोपाल कालोनी का नाम दिया गया। मंदिर में हाल ही में अपना निर्माण के ४० वर्ष पूरे किये है तथा अभी मई माह में वार्षिक उत्सव के रूप में मंदिर में भव्य आयोजन किया गया जिसमे विभिन स्थानों से हजारो भक्तो ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा कर कार्यक्रम को सफल बनाया !गोपाल मंदिर झाबुआ शहर के मध्य भाग में स्थित है ! गोपाल मंदिर से दाहोद शहर की दुरी मात्र 75 कि.मी है व इंदौर शहर से दुरी मात्र 150 कि.मी है। इसके अलावा मध्य बिंदु में स्थित होने के कारण अन्य स्थानो से गोपाल मंदिर की दुरी अधिक नही है।
           गोपाल मंदिर के पास में ही कई छोटे छोटे गॉव है जिनमें रानापुर, थांदला , जोबट, मेघनेगर आदि है जो गोपाल मंदिर से कुछ ही कि.मी की दुरी पर है । इनमें मेघनगर जो कि गोपाल मंदिर से मात्र 15 कि.मी की दुरी पर स्थित है वहॉ पर रेल्वे स्टेशन की सुविधा भी है अन्यत्र स्थानो से आने वाले लोगो के लिए जो रेल मार्ग से गोपाल मंदिर तक पहुचना चाहते है वे सीधे ही रेल मार्ग से मेघनगर आकर यहॉ से उपयुक्त व्यवस्था बस जीप आदि व्यवस्था कर बिना किसी परेशानी के गोपाल मंदिर तक पहुच सकते है।

गोपाल मंदिर आधिकारिक वेबसाइट

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आशा न्यूज़ समाचार पत्र के शुरुवात पर हार्दिक बधाई , शुभकामनाये !!!!- निर्मला भूरिया , पुर्व विधायक

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आशा न्यूज़ चैनल की शुरुवात पर बधाई , कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अंक पड़ा था तीखे तेवर , निडर पत्रकारिता इस न्यूज़ चैनल की प्रथम प्राथमिकता है जो प्रकाशित उस अंक में मुझे प्रतीत हुआ , नई शुरुवात के लिए बधाई और शुभकामनाये.- कलावती भूरिया , पुर्व जिला पंचायत अध्यक्ष

मुझे झाबुआ आये कुछ ही समय हुआ है , अभी पिछले सप्ताह ही एक शासकीय स्कूल में भारी अनियमितता की जानकारी मुझे आशा न्यूज़ द्वारा मिली थी तब सम्बंधित अधिकारी को निर्देशित कर पुरे मामले को संज्ञान में लेने का निर्देश दिया गया था समाचार पत्रो का कर्त्तव्य आशा न्यूज़ द्वारा भली भाति निर्वहन किया जा रहा है निश्चित है की भविष्य में यह आशा न्यूज़ जिले के लिए अहम कड़ी बनकर उभरेगा !!- डॉ अरुणा गुप्ता , पूर्व कलेक्टर झाबुआ

Congratulations on the beginning of Asha Newspaper .... Sharp frown, fearless Journalism first Priority of the Newspaper . The Entire Team Deserves Congratulations... & heartly Best Wishes- कृष्णा वेणी देसावतु , पूर्व एसपी झाबुआ

महज़ ३ वर्ष के अल्प समय में आशा न्यूज़ समूचे प्रदेश का उभरता और अग्रणी समाचार पत्र के रूप में आम जन के सामने है , मुद्दा चाहे सामाजिक ,राजनैतिक , प्रशासनिक कुछ भी हो, हर एक खबर का पूरा कवरेज और सच को सामने लाने की अतुल्य क्षमता निश्चित ही आगामी दिनों में इस आशा न्यूज़ के लिए एक वरदान साबित होगी, संपादक और पूरी टीम को हृदय से आभार और शुभकामनाएँ !!- संजीव दुबे , निदेशक एसडी एकेडमी झाबुआ

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