श्रावण की फुहारो के बीच निकला आकर्षक चल समारोह, नगर हुआ धर्ममय

झाबुआ । शेषावतार  श्री कल्लाजी महाराज का जन्मोत्सव स्थानीय कल्लाजी धाम शक्तिपीठ गोविंद नगर पर धुमधाम से मनाया गया । प्रातःकाल से ही यहां दूर दूर से श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था । शुभ मुहर्त में प्रातः 9 बजे कल्लाजी महाराज एवं बिराजित प्रतिमाओं का  विधि विधान के साथ अभिषेक किया गया । बडी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस अवसर पर कल्लाजी की दीव्य प्रतिमा के दर्शन वंदन किये । पूरे  मंदिर को पुष्पमालाओं एवं सजावटी सामग्री से सजाया गया । कल्लाजी महाराज की प्रतिमा का आकर्षक श्रृंगार किया गया । प्रातः 11-30 बजे से  कल्लाजी धाम से  रथ मे बिराजित कल्लाजी महाराज की प्रतिमा एवं गादीपति संतोष गेहलोत की भव्य शोभा यात्रा निकली । शोभायात्रा में राजपुती आनबान के गणवेश में श्रद्धालुजन एवं युवा वर्ग चल रहे थे । वही महिलायें भी रंग बिरंगी पोशाकों में जुलुस में शामील हुई । कल्लाजी के जय जय कारों के साथ शोभायात्रा बेंड बाजो, ताशों पुष्पवर्षा कर रही तोप एवं कडाबिन के साथ शुरू हुई । महिलाये एवं पुरूषों ने हर चौराहों पर गरबा नृत्य प्रस्त्रुत करें अपनी धार्मिक भावना उण्डेली । राजवाडा चौक पर शोभायात्रा का विभिन्न समाजजनों की और से पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया । लक्ष्मीबाई मार्ग से होते हुए  जुलुस बस स्टेंड चौराहे पर पहूंचा जहां बालिकाओ  एवं महिलाओं ने धार्मिक धुनों पर नृत्य किया । युवा भी गरबा रास मे शामील हुए । वहां से थांदला गेट होते हुए मेन बाजार , आजाद चौक, गोवर्धननाथ मंदिर से होकर कल्लाजी धाम पर समापन हुई जहां महा मंगल आरती की गई।   
        दोपहर 2-30 बजे से श्री कल्लाजी के दरबार में आयोजित गादी में बडी संख्या में लोगों की समस्याओं एवं परेशानियों का निवारण गादीपति संतोष गेहलोत के माध्यम से हुआ । प्रत्येक श्रद्धाल्रु को कल्लाजी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ । गादीपति संतोष गेहलोत ने कल्लाजी के बारे में बताते हुए कहा कि  कल्लाजी महाराज की छवि लोकदेवता जैसी बन गयी है। कल्ला जी राठौड़ ऐसे ही एक महामानव थे। उनका जन्म मेड़ता राजपरिवार में आश्विन शुक्ल 8, विक्रम संवत 1601 को हुआ था। इनके पिता मेड़ता के राव जयमल के छोटे भाई आसासिंह थे। भक्तिमती मीराबाई इनकी बुआ थीं। कल्ला जी की रुचि बचपन से सामान्य शिक्षा के साथ ही योगाभ्यास, औषध विज्ञान तथा शस्त्र संचालन में भी थी। प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ से इन्होंने योग की शिक्षा पायी। इसी समय मुगल आक्रमणकारी अकबर ने मेड़ता पर हमला किया। राव जयमल के नेतृत्व में आसासिंह तथा कल्ला जी ने अकबर का डटकर मुकाबला किया पर सफलता न मिलते देख राव जयमल अपने परिवार सहित घेरेबन्दी से निकल कर चित्तौड़ पहुँच गये। 
         राणा उदयसिंह ने उनका स्वागत कर उन्हें बदनौर की जागीर प्रदान की। कल्ला जी को रणढालपुर की जागीर देकर गुजरात की सीमा से लगे क्षेत्र का रक्षक नियुक्त किया। कुछ समय बाद कल्ला जी का विवाह शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री कृष्णा से तय हुआ। द्वाराचार के समय जब उनकी सास आरती उतार रही थी, तभी राणा उदयसिंह का सन्देश मिला कि अकबर ने चित्तौड़ पर हमला कर दिया है, अतः तुरन्त सेना सहित वहाँ पहुँचें। कल्ला जी ने विवाह की औपचारिकता पूरी की तथा पत्नी से शीघ्र लौटने को कहकर चित्तौड़ कूच कर दिया। महाराणा ने जयमल को सेनापति नियुक्त किया था। अकबर की सेना ने चित्तौड़ को चारों ओर से घेर लिया था। मेवाड़ी वीर किले से निकलकर हमला करते और शत्रुओं को हानि पहुँचाकर फिर किले में आ जाते। कई दिनों के संघर्ष के बाद जब क्षत्रिय वीरों की संख्या बहुत कम रह गयी, तो सेनापति जयमल ने निश्चय किया कि अब अन्तिम संघर्ष का समय आ गया है। उन्होंने सभी सैनिकों को केसरिया बाना पहनने का निर्देश दिया। इस सन्देश का अर्थ स्पष्ट था। 23 फरवरी, 1568 की रात में चित्तौड़ के किले में उपस्थित सभी क्षत्राणियों ने जौहर किया और अगले दिन 24 फरवरी को मेवाड़ी वीर किले के द्वार खोल कर भूखे सिंह की भाँति मुगल सेना पर टूट पड़े। भीषण युद्ध होने लगा। राठौड़ जयमल के पाँव में गोली लगी। उनकी युद्ध करने की तीव्र इच्छा थी पर उनसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था। कल्ला जी ने यह देखकर जयमल के दोनों हाथों में तलवार देकर उन्हें अपने कन्धे पर  बैठा लिया। इसके बाद कल्ला जी ने अपने दोनों हाथों में भी तलवारें ले लीं।
          चारों ओर तलवारें बिजली की गति से चलने लगीं। मुगल लाशों से धरती पट गयी। अकबर ने यह देखा, तो उसे लगा कि दो सिर और चार हाथ वाला कोई देवता युद्ध कर रहा है। युद्ध में वे दोनों बुरी तरह घायल हो गये। कल्ला जी ने जयमल को नीचे उतारकर उनकी चिकित्सा करनी चाही पर इसी समय एक शत्रु सैनिक ने पीछे से हमला कर उनका सिर काट दिया। सिर कटने के बाद के बाद भी उनका धड़ बहुत देर तक युद्ध करता रहा। इस युद्ध के बाद कल्ला जी का दो सिर और चार हाथ वाला रूप जन-जन में लोकप्रिय हो गया। आज भी लोकदेवता के रूप में चित्तौड़गढ़ में भैंरोपाल पर उनकी छतरी बनी है।