सिलकोसिस और लोगों का 'शांत' होना 
      गुजरात से सटे मध्य प्रदेश के आदिवासी- बहुल इलाके झाबुआ के गांवों में तस्वीर तेजी से बदल रही है। वैसे यह इलाका गुजरात से आयातित जानलेवा सिलकोसिस बीमारी के हृदय विदारक प्रसंगों से अटा हुआ है। हर गांव में पांच-छह परिवारों में अपनों को खोने की टीस धंसी हुई है। वे गरीबी और बेरोजगारी से बचने के लिए गुजरात में सफेद पत्थर तोड़ने के लिए जाते हैं और बड़ी संख्या में फेफड़ों को छलनी करके सिलकोसिस लेकर घर लौटते हैं और शांत हो (मर) जाते हैं। 
           आज झाबुआ की धरती में गुजरात में पत्थर तोड़ने के लिए कोई तैयार नहीं होता है। उनके लिए गुजरात में यह काम करना मौत के मुंह में जाने का पर्याय बन चुका है। हालांकि, गुजरात पर उनकी और कारोबार के लिए गुजरात की झाबुआ पर जबर्दस्त निर्भयता बनी हुई है। इसके अलावा, हिंदुत्ववादी राजनीति के प्रचार-प्रसार में भी इन दोनों राज्यों में जबर्दस्त समानता है।
               झाबुआ इसकी प्रयोगस्थली के रूप में विकसित की जा रही है। झाबुआ की धरती में धीरे-धीरे तह जमा रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार के बारे में विस्तार से पूरे उत्साह से जब मथुर बता रहे थे तो झाबुआ में पिछले कुछ समय से चल रहे हिंदुत्व के प्रयोग को कड़ी-दर-कड़ी जोड़कर देखने की राह मिल रही थी। 
आरएसएस और समझदार 
      एक नई परिभाषा मिली, आरएसएस यानी समझदार लोगों का चुनाव। इस पूरे इलाके में ज्यादा समझदार वही मिले, जिनके पास छोटी-मोटी दुकानें हैं या कोई कारोबार का आसरा। बाकी आदिवासी समाज अपनी दिहाड़ी जुटाने में व्यस्त। हारी-बीमारी से घिरा हुआ। पत्थर तुड़ाई की खदान से लेकर सुधीर शर्मा (जेल में बंद व्यापमं अभियुक्त, जिसके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जाहिराना तौर पर गहरे संबंध रहे हैं) की मैगनीज की खदान में खून-पसीना एक करता हुआ, सूखे की मार झेलते हुए, खेतों में मक्के की खेती को लाभदायक बनाने की जुगत बैठाने में लगा रहता है। लेकिन आरएसएस को जानते सब हैं, बजरंग बली से भी सब वाकिफ हैं। आसपास के तमाम गांवों में चक्कर लगाने पर जो बातें उभर कर आई, उनके कुछ सूत्र आरएसएस का पूरा नाम क्या है,’ ये  तो नहीं जानते, पर ये पता है कि अच्छा काम करते हैं, पाप नहीं होने देते हैं,’ हर एक गांव में एक-दो लोग काम देखते हैं, हमारे गांव में हनुमान जी का फोटो दिए थे, आरएसएस के लोग, तब लोग समझदार हुए। घर-घर में बजरंगबली।’ 
         पूरे इलाके में हनुमान के छोटे-बड़े मंदिर भी खूब नजर आते हैं। आस्था के नए केंद्र विकसित हो रहे। इनकी गूंज और उपस्थति पूरे इलाके में महसूस की जा सकती है। 
संस्कृति, हिंदुत्व की छाप और विकास संवाद का मंथन 
तेजी से बदल रहे झाबुआ के मौसम में जमीनी मुद्दों पर पड़ताल करने के लिए जनपक्षधर सवालों के लिए प्रतिबद्ध संस्था विकास संवाद में स्वास्थ्य और मीडिया पर तीन दिन की कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें ऐसे मुद्दों पर चर्चा हुई जो मुख्यधारा के मीडिया से सामान्य तौर पर नहीं शामिल किए जाते हैं। समाज का ताप ऐसे तमाम आयोजनों पर महसूस होता है। यहीं मुलाकात हुई बाडवानी के मोहन सुलिया से। उन्होंने बताया कि किस तरह आदिवासी समाज में गहरे तक हिंदुत्व ने पैठ बना ली है। उन्होंने बताया कि किस तरह आदिवासी शादी में बज रहे डीजे में सबसे पहले यह बजता है, गर्व से कहो हम हिंदू हैं, सिर्फ हिंदू की संतान बचेगा।’ इस तरह के परिवर्तन हर कदम पर दिखाई देते हैं। यहां तक कि ईद-उल-फितर को झाबुआ की गलियों में बड़ी धूमधाम से जगन्नाथ की यात्रा निकाली गई जबकि झाबुआ का जगन्नाथ यात्रा से कोई रिश्ता नहीं है, फिर भी इतना भव्य आयोजन-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की कहानी बयां कर रहा था। 
भील और उनके घोड़े 
इसके बरक्स आदिवासी समाज के अपने आस्था के केंद्र भी कायम हैं। कचलदरा गांव की एक फलिया के पटेल दिनेश राय सिंह (भील) ने अपनी शीतला देवी का थान (स्थान) दिखाते हुए बताया कि असल शक्ति अब भी यहीं से मिलती है। वहां एलोवेरा की झाड़ी के आगे कुछ घड़े और मिट्टी के छोटे-छोटे आकार के घोड़े रखे हैं। घोड़ों को वह देवी की सवारी बताते हैं। यहीं मथुर दिखाते हैं बलि का स्थान। दो पत्थर रखे हैं और वहीं दी जाती है बलि। पास खड़े बुजुर्ग नूर सिंह बताते हैं कि यहां पूजा के समय दारू भी चढ़ाई जाती है। जब पूछा, क्या आरएसएस वाले इस पूजा में भी शामिल होते हैं, तो उन्होंने बताया, नहीं। वे बड़े भगवान की पूजा करने को कहते हैं। 

झाबुआ- बदलते परिवेश की तेजी सी बदलती तस्वीर- Jhabua-changing-rapidly-changing-environment-particularly-Article

कड़कनाथ मुर्गे की तासीर 
झाबुआ में सुबह कडक़नाथ की बांग के साथ होती है या नहीं, लेकिन छाया हर जगह कड़कनाथ ही रहता है। कड़कनाथ मुर्गा झाबुआ की शान है, क्योंकि यह कहीं और नहीं होता। इसे लेकर तमाम किस्से इलाके में मशहूर है। कलगी काली, देह काली, मांस काला, रक्तभी कालापन लिए, कडक़नाथ मुर्गा अपनी कड़क तासीर के लिए 90 फीसदी आदिवासी-बहुल झाबुआ को मध्य प्रदेश में खास बनाता है, लेकिन व्यापमं को लेकर कड़कनाथ की छाया नहीं दिखाई देती। कड़कनाथ मुर्गे की खासियत के बारे में जितनी कड़क और बुलंद आवाज में बताते हैं, व्यापमं की चर्चा आते ही पूरी टोन बदल जाती है। मौत के खौफ की स्याह परछाईं उनके चेहरे पर बादलों-सी उड़ती-फिरती है।
 व्यापमं और मौत का साया 
सबको पता है कि व्यापमं एक ऐसी बला का नाम है जिसके पास जो गया, सो शांत हो गया। मौत को यहां कहते हैं शांत होना। झाबुआ पर व्यापमं की स्याह छाया की गहरी जकड़न महसूस की जा सकती है। व्यापमं का आदिवासी नौजवानों पर कितना खौफनाक असर पड़ा है, इसे यहां पर महसूस किया जा सकता है। बताया जाता है कि झाबुआ से 50 लोग अभियुक्त बनाए गए हैं। यानी सारे आदिवासी नौजवान। डर के मारे बड़ी संख्या में शिक्षित आदिवासी नौजवान बाहर भी भागे हुए हैं। झाबुआ की नम्रता डामोर की 2012 में हुई हत्या (पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार) के बाद से यहां के तमाम दूसरे परीक्षार्थियों और उनके परिजनों पर जो खौफ जारी था, अब वह पत्रकार अक्षय सिंह की मौत के बाद और गहरा हो गया है। नम्रता, ओम प्रकाश और अक्षय सीबीआई द्वारा नम्रता डामोर की हत्या के मामले की फिर से जांच शुरू होने से एक तरफ जहां नम्रता के परिजनों को इस बात की आस बंधी है कि अब शायद न्याय की दिशा में छानबीन बढ़े, वहीं दबी जुबान में यह भी कहा जा रहा है कि इस प्रकरण को व्यापमं से अलग कर एक प्रेम प्रसंग के रूप में करने की कोशिश की जा रही है। 
        नम्रता के भाई ओम प्रकाश डामोर से मुलाकात का वाकया भी कम दिलचस्प नहीं रहा। गहरे संकोच और शंकाओं को चीरते हुए ओम अपने एक दोस्त के यहां मिलने को जब तैयार हुए तो मेरे जेहन में सिर्फ अक्षय की मौत का रहस्य हावी था। रास्ते में होने वाली दुर्घटनाएं कई बार किसी बड़ी कड़ी का हिस्सा लगने लगीं। यह डर झाबुआ की हवा में हर कोई महसूस कर रहा था। सत्ता, माफिया और मौत के बेहया खेल की गवाह यह धरती रही है। ओम ने गहरे आक्रोश के साथ बताया, अक्षय सिंह की मौत के बाद नम्रता का केस दोबारा खोला लेकिन दो घंटे में बंद कर दिया गया। जब हमने इसकी वजह जाननी चाही, तो कहा गया कि चूंकि कोई नया सबूत नहीं मिला है, इसलिए बंद किया मामला। यह तो समय ही बताएगा कि सीबीआई की पड़ताल क्या उन चार लड़कों से कोई सच उगलवा पाएगी जिन पर नम्रता के परिजनों ने शक जाहिर किया था। बहरहाल सच पर अभी गहरा पर्दा पड़ा हुआ है।
 खनन, दबदबा और निगाहें 
झाबुआ की एक पहचान और है। यह व्यापमं के अभियुक्त और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए सुधीर शर्मा का इलाका है। यहां उनकी खाम का दबदबा बदस्तूर जारी है। यहां से गुजरते हुए इसका दबदबा महसूस किया जा सकता है। 
           झाबुआ का दाल पनिया जितना सरस है, उतनी ही जटिल है यहां की जमीन। रहस्य-मौतें और मौतों के खौफ के बीच आदिवासी घरों में जहां महुआ की शराब 60 रुपये में औरतें बेचती मिलती हैं, वहीं बीयर की खपत इतनी बढ़ गई है कि खेतों को पार करते वक्त इसकी बोतलें पांव से टकराती हैं।