1 26 january 1 abvp 45 Administrative 1 b4 cinema 1 balaji dhaam 1 bhagoria 1 bhagoria festival jhabua 2 bjp 1 cinema hall jhabua 27 city 16 crime 19 cultural 35 education 2 election 15 events 12 Exclusive 1 Famous Place 6 gopal mandir jhabua 17 Health and Medical 78 jhabua 4 jhabua crime 1 Jhabua History 1 matangi 3 Movie Review 5 MPPSC 1 National Body Building Championship India 4 photo gallery 18 politics 2 ram sharnam jhabua 48 religious 5 religious place 2 Road Accident 3 sd academy 65 social 13 sports 1 tourist place 13 Video 1 Visiting Place 11 Women Jhabua 2 अखिल भारतीय किन्नर सम्मेलन 1 अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद 1 अंगूरी बनी अंगारा 1 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 15 अपराध 1 अल्प विराम कार्यक्रम 6 अवैध शराब 1 आदित्य पंचोली 1 आदिवासी गुड़िया 1 आरटीओं 1 आलेख 1 आवंला नवमी 3 आसरा पारमार्थिक ट्रस्ट 1 ईद 1 उत्कृष्ट सड़क 20 ऋषभदेव बावन जिनालय 3 एकात्म यात्रा 2 एमपी पीएससी 1 कलाल समाज 1 कलावती भूरिया 3 कलेक्टर 14 कांग्रेस 6 कांतिलाल भूरिया 1 कार्तिक पूर्णिमा 2 किन्नर सम्मेलन 2 कृषि 1 कृषि महोत्सव 3 कृषि विज्ञान केन्द्र झाबुआ 1 केरोसीन 2 क्रिकेट टूर्नामेंट 4 खबरे अब तक 1 खेडापति हनुमान मंदिर 15 खेल 1 गडवाड़ा 1 गणगौर पर्व 1 गर्मी 1 गल पर्व 8 गायत्री शक्तिपीठ 2 गुड़िया कला झाबुआ 1 गोपाल पुरस्कार 4 गोपाल मंदिर झाबुआ 1 गोपाष्टमी 1 गोपेश्वर महादेव 14 घटनाए 1 चक्काजाम 3 जनसुनवाई 1 जय आदिवासी युवा संगठन 5 जय बजरंग व्यायाम शाला 1 जयस 6 जिला चिकित्सालय 3 जिला जेल 3 जिला विकलांग केन्द्र झाबुआ 1 जीवन ज्योति हॉस्पिटल 9 जैन मुनि 6 जैन सोश्यल गुुप 2 झकनावदा 80 झाबुआ 1 झाबुआ इतिहास 1 झाबुआ का राजा 3 झाबुआ पर्व 9 झाबुआ पुलिस 1 झूलेलाल जयंती 1 तुलसी विवाह 6 थांदला 3 दशहरा 1 दस्तक अभियान 1 दिल से कार्यक्रम 3 दीनदयाल उपाध्याय पुण्यतिथि 1 दीपावली 2 देवझिरी 38 धार्मिक 5 धार्मिक स्थल 7 नगरपालिका परिषद झाबुआ 5 नवरात्री 4 नवरात्री चल समारोह 4 नि:शुल्क स्वास्थ्य मेगा शिविर 1 निर्वाचन आयोग 4 परिवहन विभाग 1 पर्यटन स्थल 3 पल्स पोलियो अभियान 7 पारा 1 पावर लिफ्टिंग 14 पेटलावद 1 प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय 3 प्रतियोगी परीक्षा 1 प्रधानमंत्री आवास योजना 30 प्रशासनिक 1 बजरंग दल 2 बाल कल्याण समिति 1 बेटी बचाओं अभियान 2 बोहरा समाज 1 ब्लू व्हेल गेम 1 भगोरिया पर्व 1 भगोरिया मेला 3 भगौरिया पर्व 1 भजन संध्या 1 भर्ती 2 भागवत कथा 28 भाजपा 1 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान 1 भारतीय जैन संगठना 3 भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा 1 भावांतर योजना 2 मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग 1 मल्टीप्लेक्स सिनेमा 2 महाशिवरात्रि 1 महिला आयोग 1 महिला एवं बाल विकास विभाग 1 मिशन इन्द्रधनुष 1 मुख्यमंत्री महिला सशक्तिकरण योजना 2 मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चोहान 8 मुस्लिम समाज 1 मुहर्रम 3 मूवी रिव्यु 6 मेघनगर 1 मेरे दीनदयाल सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता 2 मोड़ ब्राह्मण समाज 1 मोदी मोहल्ला 1 मोहनखेड़ा 2 यातायात 1 रंगपुरा 2 राजगढ़ 12 राजनेतिक 8 राजवाडा चौक 11 राणापुर 5 रामशंकर चंचल 1 रामा 1 रायपुरिया 1 राष्ट्रीय एकता दिवस 2 राष्ट्रीय बॉडी बिल्डिंग चैम्पियनशीप 4 राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना 1 राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण 1 रोग निदान 2 रोजगार मेला 15 रोटरी क्लब 2 लक्ष्मीनगर विकास समिति 1 लाडली शिक्षा पर्व 2 वनवासी कल्याण परिषद 1 वरदान नर्सिंग होम 1 वाटसएप 1 विधायक 4 विधायक शांतिलाल बिलवाल 1 विश्व उपभोक्ता संरक्षण दिवस 2 विश्व विकलांग दिवस 2 विश्व हिन्दू परिषद 1 वेलेंटाईन डे 3 व्यापारी प्रीमियर लीग 1 शरद पूर्णिमा 5 शासकीय महाविद्यालय झाबुआ 32 शिक्षा 1 श्रद्धांजलि सभा 3 श्री गौड़ी पार्श्वनाथ जैन मंदिर 9 सकल व्यापारी संघ 2 सत्यसाई सेवा समिति 1 संपादकीय 2 सर्वब्राह्मण समाज 4 साज रंग झाबुआ 33 सामाजिक 1 सारंगी 11 सांस्कृतिक 1 सिंधी समाज 1 सीपीसीटी परीक्षा 3 स्थापना दिवस 3 स्वच्छ भारत मिशन 4 हज 3 हजरत दीदार शाह वली 5 हाथीपावा 1 हिन्दू नववर्ष 5 होली झाबुआ

          आदिवासी अंचलों में भगोरिया हाट प्रारंभ होने के सात दिन पूर्व से जो बाजार लगते है, उन्हें आदिवासी अंचल में त्यौहारिया हाट अथवा सरोडिया हाट कहते है। भगोरिया पर्व आदिवासियों का महत्वपूर्ण त्यौहार है। इसलिए भगौरिया हाट प्रारंभ होने से पूर्व के साप्ताहिक हाट में इस त्योहार को मनाने के लिए अंचल के आदिवासी ढोल, मांदल, बांसुरी, कपडे,गहने एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी करते है। अर्थात साज-सज्जा का सामान खरीदते है। इसीलिए इन्हें त्यौहारिया हाट कहा जाता है।
क्या है भोगर्या अथवा भगोरिया पर्व
bhagoria festival jhabua-झाबुआ अलीराजपुर भगौरिया पर्व - आदिवासी संस्कृति की अद्भुत मिसाल
Jhabua Bhaoria
               कुछ लोग इसे पारंपरिक प्रणय पर्व भी कहते है। कहा जाता है कि इन हाट बाजारों में आदिवासी युवक-युवती एक दूसरे को पसंद करते है और बाजार में एक दूसरे को गुलाल लगाते है। युवक पहले युवती को गुलाल लगाता है, यदि युवती की सहमती होती है, तो वह भी युवक को गुलाल लगाकर सहमती प्रकट करती है। यदि वह असहमत होती है,तो गुलाल को पौछ देती है। सहमती पर दोनो एक दूसरे के साथ भाग जाते है। गांव वाले भगोरिया हाट में बने प्रेम प्रसंग को विवाह सूत्र में बांधने के लिए दोनो परिवारो से बातचीत करते है और होलिका दहन हो जाने के बाद विवाह संपन्न करवाये जाते है। भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है। इसी तरह सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो हाँ समझी जाती है।  
भगोरिया का इतिहास
           भगोरिया कब औऱ क्यों शुरू हुआ। इस बारे में लोगों में एकमत नहीं है। भगोरिया पर लिखी कुछ किताबों के अनुसार भगोरिया राजा भोज के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। इस समय दो भील राजाओं कासूमार औऱ बालून ने अपनी राजधानी भगोर में विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील राजाओं ने भी इन्ही का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भगोरिया कहना शुरू हुआ। वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों का मानना है क्योंकि इन मेलों में युवक-युवतियाँ अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं इसलिए इसे भगोरिया कहा जाता है। 

झाबुआ भगोरिया पर्व
—  Jhabua Bhagoria  —
राज्य मध्य प्रदेश्, Flag of India.svg भारत
त्यौहार होली
माह फाल्गुन माह (फरवरी-मार्च)
पर्व देवता भंगोरा देव
अंचल मालवा
स्थान अलीराजपुर,झाबुआ,धार,खरगोन
महिला परिधान **बजकरी, बाहटिया, कंदोरा, तागली, सर, हाकली, घेरदार घाघरा, लुगड़ा, वैलरी और चांदी के आभूषण
पुरुष परिधान धोती, कमीज, बंडी और झूलड़ी
आभूषण **बस्ता काड़ा (आर्मलेट), खली वाला कडा (कलाई के लिए), दाल और कावली (चूड़ी), तागली (हार), पान वाला हायर (गर्दन के लिए), झुमकी (बालियां),अंगोथा और कंडोरा
वाद्य यंत्र ढोल,मांदल, बांसुरी, कुंडी, थाली ओर घुंघरू
मेले के व्यंजन गुड की जलेबी,भजिये,खारिये (सेव),पान ,कुल्फी ,केले
गीत आदिवासी लोक गीत
मुख्य विशेषताएं हाट, मेला और शादी का बाजार
जाती भील,भिलाला,पाटलिया और राठिया
प्रमुख पेय ताड़ी
    कुछ ग्रामीण बताते है कि भगोरिया भगोर रियासत को जीतने का प्रतीक पर्व है। भगौरिया पर्व भगौर रियासत की जीत की बरसी के रूप में खुशी को जाहिर करने के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर आदिवासी खूब नाचते है। गाना,गाते हें ठिठौली करते है। सामूहिक नृत्य इस पर्व की मुख्य विशेषता है। लेकिन समय के साथ-साथ यह प्रकृति और मनुष्य के रिश्तों को अभिव्यक्त करने वाला त्यौहार बन गया है।
    
गोट प्रथा थीः- ग्रामीण बताते है कि भगोरिया हाटो में पहले महिलाएं समूह में बाजार में आती थी एवं किसी परिचित पुरूष को पकडकर उससे ठिठौली करती थी एवं उसके बदले उस पुरूष से मेले में धूमने एवं झूलने का खर्च लेती थी या पान खाती थी। इस प्रथा को गोट प्रथा कहा जाता था। यह भगौरिया हाट की परंपरा मानी जाती थी।
             भगोरिया पर्व को लेकर किवदन्तियों के अनुसार भगोर किसी समय अंचल का प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र हुआ करता था और यहां के ग्राम नायक द्वारा एक बार जात्रा का आयोजन किया गया। जिसमें आस पास के सभी युवक युवतियों को आमत्रित किया गया। सज धज कर युवक युवतियों ने हिस्सा लिया। ग्राम नायक ने इस अवसर पर मेले जैसा आयोजन किया। आये हुए आगन्तुकों में एक सुन्दर एवं कमसीन बाला को देख कर ग्राम नायक का दिल उस पर आ गया ओर उसने उसे पान का बिडा पेश किया तो शर्मा कर उसने कबुल कर लिया और ग्राम नायक ने उस कन्या की सहमति से उसका अपहरण कर लिया याने उसे भगा कर ले गया और इसी परम्परा की शुरूवात को भगौरिया का नाम दिया गया एक और किवदन्नी के अनुसार शिव पुराण में भी भगोरिया का उल्लेख आता है जिसके अनुसार भव एवं गौरी शब्द का अपभ्रश भगोरिया के रूप में सामने आया है। भव का अर्थ होता है शिव और गौरी का अर्थ पार्वती होता है।-दोनों के एकाकार होने को ही भवगौरी कहा जाता है। अर्थात फाल्गुन माह के प्रारंभ में जब शिव ओर गौरी एकाकार हो जाते है तो उसे भवगौरी कहा जाता है। और यही शब्द अप्रभंश होकर भगोरिया के नाम से प्रचलित हुआ है।
          होली पर्व के सात दिन पूर्व से जिस ग्राम एवं नगर में हाट बाजार लगते है उसकों भगोरिया हाट कहा जाता है। भगोरिया पर्व,में आदिवासियों द्वारा गल देवता की मन्नत लेकर सात्विक जीवन व्यतित किया जाता है, जमीन पर सोते है तथा ब्रहमचर्य व्रत का पालन करते है तथा इन भगोरियो में सफेद वस्त्र लपेट कर शरीर पर पीली हल्दी लगा कर तथा हाथ में नारियल लेकर आते है। गल देवता की मन्नत लेकर सात दिन तक उपवास परहेज करते है एवं होलिका दहन के दूसरे दिन गल देवता को जो लकड़ी का बना लगभग 30-40 फीट ऊँचा होता है। उस पर मन्नत वाला व्यक्ति चढ जाता है। एवं उसे अन्य व्यक्तियों द्वारा रस्सी से उपर धुमाया जाता है। इसी प्रकार मन्नत उतारते है। भगोरिया पर्व का वास्तविक आधार देखे तो पता चलता है कि इस समय तक फसले पक चुकी होती है तथा किसान अपनी फसलों के पकने की खुशी में अपना स्नेह व्यक्त करने के लिये भगोरिया हाट में आते है।
         भगोरिया हाट में झुले चकरी, पान,मीठाई,सहित श्रृंगार की सामग्रिया,गहनों आदि की दुकाने लगती है जहां युवक एवं युवतियां अपने अपने प्रेमी को वेलेण्टाईन की तरह गिफ्ट देते नजर आते हैं। आज कल भगोरिया हाट से भगा ले जाने वाली घटनायें बहुत ही कम दिखाई देती है क्योकि शिक्षा के प्रसार के साथ शहरी सभ्यता की छाप लग जाने के बाद आदिवासियों के इस पर्व में काफी बदलाव दिखाई दे रहा है।
आभूषण
अलंकरण अपना विशेष महत्‍व रखता है। सामान्‍यत: भील स्‍त्री पुरूष विविध प्रकार के गहने पहनते हैं। ये गहरे कथीर , चाँदी और कांसे के बने होते हैं। जिनमें से भी कथीर का प्रचलन सर्वाधिक है। आज के वर्तमान संदर्भो में जहां पारम्‍परिक आदिवासी आभूषणों को आधुनिक समाज ने फैशन के नये आयामों के रूप में स्‍वीकार कर लिया है तो आदिवासी शिल्‍पों में उसका महत्‍व और अधिक हो जाता है। आदिवासी संस्‍कृति के अनुरूप कमर में काले रंग का मोटा घागा (बेल्‍ट नुमा) पहनाए जाते हैं। स्‍त्री के पैरों में कड़ला, बाकडिया, रमजोल, लंगरलौड, नांगर, तोडा, पावलिया, एवं पैरो की अंगुलियों में बिछिया जो कि भीली महिलाओं के सौभाग्‍य के प्रतीक आभूषण होते हैं, धारण करती है।
                  गले में तागली, हंसली या गलसन (मोतियों की माला), जबरबंद (पैसों की माला), कानों में बालियां, टोकडी, मोरफैले, झांझऱया(एक गोल रिंग में गोल गोल कथीर के छल्‍ले), हाथ में बाहरिया, हठका, करोंदी, कावल्‍या (कांच की चूडिया),हाथसांकरी, भुजा में बास्‍टया (बाजूबंद), हठके, हाथ की अंगुलियों में मुंदडी, सिर पर बोर राखडी (छिवरा), झेला (चाँदी की लडियों वाला सांकल),बस्‍का (चाँदी या कथीर के चिमट) आदि पहने जाते हैं। इसी तरह पुरूषों के हाथों में बौहरिया,कमर में कंदोरा, कानों में मोरखी, गले में तागली पहनाई जाती है। पुरूष कानों में मूंदड़े, टोटवा, गले में बनजारी या सांकल, हाथ में नारह-मुखी(चाँदी के कड़े), भुजा में हठके तथा पाँव में बेडी पहनते हैं।
                  कहा तो यह भी जाता कि भगोरिया भव अर्थात भगवान शंकर व गौरी अर्थात पार्वती के अनूठे विवाह की याद में उस विवाह की तर्ज पर भवगौरी अर्थात भगोरिया नाम से अब तक मनाया जाता है। भगवान शंकर का पुरूषार्थ व प्रणय ही इसी कारण से इसके मुख्य अवयव भी रहे हैं। बहरहाल आदिम संस्कृति की उम्र वे तेवर से जुड़े होने के कारण भगोरिया आदिवासी वर्ग की महत्वपूर्ण धरोहर है । इसे उतनी ही पवित्रता से देखा व स्वीकार किया जाना चाहिए। जिस पवित्रता के साथ किसी भी संस्कृति का वर्तमान अपने अतीत को स्वीकार करता है। इसी में भगोरिए के हर स्वरूप की सार्थकता भी है।
ताड़ी की खुमारी में डूबे ग्रामीणों की कुर्राटी की आवाज सुनाई देती है। युवकों की अलग-अलग टोलियां सुबह से ही बांसुरी-ढोल-मांदल बजाते मेले में घूमते हैं। वहीं, आदिवासी लड़कियां हाथों में टैटू गुदवाती हैं। आदिवासी नशे के लिए ताड़ी पीते हैं। हालांकि, वक्त के साथ मेले का रंग-ढंग बदल गया है। अब आदिवासी लड़के परम्परागत कपड़ों की बजाय अत्याधुनिक परिधानों में ज्यादा नजर आते हैं। मेले में गुजरात और राजस्थान के ग्रामीण भी पहुंचते हैं। हफ्तेभर काफी भीड़ रहती है।

महुए के फल से बनाई जाती है ताड़ी  
पर्यटन विकास निगम द्वारा लगाया जाता है टेंट विलेज
भगोरिया मेले में आने वाले विदेशी पर्यटकों हेतु पर्यटन विकास निगम द्वारा आलीराजपुर जिले के सोंडवा गांव में टेंट विलेज बनाया जाता है ।

आलीराजपुर जिले के सोंडवा गांव में टेंट विलेज


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झाबुआ एवं अलीराजपुर जिले का भगोरिया पर्व प्रदेश को संस्कृति के क्षेत्र में विश्व मानचित्र में विशेष स्थान दिलाता है। ग्रीष्म ऋतु की दस्तक के एहसास के साथ आम के मौरो की खुशबू से सराबोर मदमस्त फागुनी हवाओं के झोको के साथ आदिवासियों का लोकप्रिय पर्व भगौरिया होलिका दहन होने के सात दिन पूर्व से प्रारंभ होता है।

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